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अपवाह प्रतिरूप (अध्याय -19 भारत का भूगोल )

अपवाह प्रतिरूप

– नदियों के प्रवाह के स्वरूप को अपवाह प्रतिरूप कहते हैं।

पूर्ववर्ती अपवाह प्रतिरूप

– पूर्ववर्ती अपवाह प्रतिरूप केवल हिमालय क्षेत्र में पाया जाता है।

Ex- सिंधु, सतलज, गंगा, ब्रम्हपुत्र

Note- सिंधु सतलज एवं ब्रम्हपुत्र नदियां वृहद हिमालय लघु हिमालय तथा शिवालिक हिमालय को काट कर बहती हैं परंतु गंगा नदी वृहद हिमालय से निकलती है तथा लघु हिमालय एवं शिवालिक हिमालय को काटती हैं, इसलिए गंगा नदी भी पूर्ववर्ती नदी है।

अध्यारोपित अपवाह प्रतिरूप

– केवल प्रायद्वीपीय भारत की नदियों में पाया जाता है।

Ex- चंबल, सोन, दामोदर, नर्मदा, तापी, गोदावरी, कृष्णा

– क्रिस्टेसियस काल में जो प्रायद्वीपीय भारत का पठार अफ्रीका से टूटकर अलग हुआ है तो प्रायद्वीपीय भारत के पठार पर ज्वालामुखी लावा के प्रवाह के कारण यहां की नदियों की घाटियों में लावा भर गया तथा लावा के जमने से बेसाल्ट चट्टाने बन गई तथा वर्षा के कारण यह विशाल चट्टानें धीरे धीरे अपरदित हो गई परिणाम स्वरुप नदियां फिर से अपनी पुरानी घाटियों में बहने लगी।

वृक्षाकार अपवाह प्रतिरूप

– जब सहायक नदियां मुख्य नदी से इस तरह मिलती है की पूरा नदी तंत्र वृक्षों की शाखाओं की तरह प्रतीत हो तो उसे वृक्षाकार अपवाह प्रतिरूप कहते हैं।

– वृक्षाकार अपवाह प्रतिरूप उत्तर भारत के मैदान में गंगा नदी और

– प्रायद्वीपीय भारत में गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, नदियों द्वारा बनाया जाता है।

 

– जब एक केंद्रीय उच्च भूमि से निकलकर नदियां अलग-अलग दिशाओं में प्रवाहित हो जाती हैं तो ऐसे अपवाह प्रतिरूप को अरीय उपकेंद्रीय अपवाह प्रतिरूप कहते हैं ।

Ex- भारत में अमरकंटक पठार पर तथा रांची पठार पर अरिय या अपकेंद्रीय अपवाह प्रतिरूप पाया जाता है।

 

– जब बहुत सी नदियां एक तीव्र ढाल पर प्रवाहित होती हैं तथा एक दूसरे से समान अंतर पर प्रवाहित होती हैं तो उसे समानांतर अपवाह प्रतिरूप कहते हैं।

Ex- भारत में पश्चिमी घाट से निकलकर पश्चिमी तटीय मैदान पर प्रवाहित होने वाली नदियां

– ऐसे नदियों के उद्गम तथा मुहाना के बीच बहुत कम दूरी होती है।

– जब नदी बहते हुए सतह पर अचानक विलुप्त हो जाती है तो इसे खंडित या विलुप्त अपवाह प्रतिरूप कहते हैं।

– हिमालय की नदियां शिवालिक में बड़े-बड़े शिलाखंडों में विलुप्त हो जाती हैं।

– उत्तर भारत के मैदान के भाबर क्षेत्र में नदियां सतह पर विलुप्त हो जाती हैं क्योंकि नदियां चट्टानों के बीच मे  दरारों से बहने लगती हैं।

– लूनी नदी

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4 thoughts on “अपवाह प्रतिरूप (अध्याय -19 भारत का भूगोल )

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