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भारत में प्राकृतिक वनस्पति भाग-3 (अध्याय -30 भारत का भूगोल )

– क्षोभ मंडल में 14 किलोमीटर ऊंचाई के साथ लगातार तापमान में गिरावट आती रहती है क्योंकि क्षोभमंडल की औसत ऊंचाई 14 किलोमीटर है।

क्षोभमंडल में प्रत्येक 1 किलोमीटर की ऊंचाई पर जाने पर 6.5 डिग्री सेल्सियस तापमान में कमी आ जाती है इसे वायुमंडल का सामान्य ताप ह्रास दर कहते हैं। यही कारण है कि पर्वतों पर थोड़ी-थोड़ी उचाई के अंतराल पर जलवायु में परिवर्तन आ जाता है जिसके कारण पर्वतों पर थोड़ी थोड़ी दूर पर ही अलग-अलग वनस्पतियां पाई जाती हैं।

– भारत में पर्वतीय वन दो जगहों पर पाए जाते हैं।

1- हिमालय पर

2- दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में

हिमालय के पर्वतीय वन

– हिमालय पर उचाई पर जाने पर अलग-अलग जलवायु वाले वन मिलते हैं।

– 1500m की ऊंचाई तक सदाबहार वन एवं पतझड़ वाले वन मिश्रित रूप में पाए जाते हैं।

– 1500m से 2500m की ऊंचाई तक शीतोष्ण चौड़ी पत्ती वाले वन पाए जाते हैं।

– देवदार, ओक, बर्च, मैफिल, नामक वृक्ष

देवदार मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश की विशेषता है।

पश्चिमी हिमालय के तीनों राज्यों में जम्मू कश्मीर हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड के शीतोष्ण जलवायु के पेटी में देवदार, ओक, बर्च, तथा मैपिल जैसे वनस्पति पाये जाते हैं।

– 2500 से 4500 तक कि उचाई तक कोणधारी वन पाये जाते हैं।

– चीड़, स्प्रूस, फर, सनोवर, ब्लूपाइन

– 4500m से 4800m के बीच टुंड्रा वनस्पति पाई जाती है। टुंड्रा वनस्पति मुख्य रूप से बर्फीले क्षेत्रों में पाए जाने वाले घास होते हैं।

जैसे – काई, घास, लिचेन

4800m से ऊपर

– हिमालय पर 4800 मीटर से ऊपर जाने पर कोई वनस्पति नहीं मिलती बल्कि यह पूरा क्षेत्र हिमाच्छादित रहता है।

दक्षिण भारत के पर्वतीय वन

– दक्षिण भारत में 3 पहाड़ियों पर पर्वतीय वन पाए जाते हैं।

1- नीलगिरी पहाड़ी/ पर्वत

2- अन्नामलाई पर्वत

3- पालनी पहाड़ी

इन तीनों पहाड़ियों के कुछ कुछ क्षेत्रों में शीतोष्ण वन पाए जाते हैं जिन्हें दक्षिण भारत में शोलास कहते हैं।

शोलास वनों के मुख्य वृक्ष लारेल, मैगनोलिया, सीनेकोना है।

– दक्षिण भारत के पर्वतों की ऊंचाई अधिक नहीं है अतः यहां कोणधारी वन नहीं पाए जाते हैं।

ज्वारीय वन या डेल्टाई वन या मैंग्रोव वन

– भारत के तटीय क्षेत्रों में जहां नदियां अपना डेल्टा बनाती हैं तथा इन डेल्टा क्षेत्र में वृक्ष पाए जाते हैं जिसे डेल्टाई वन या ज्वारीय वन कहते हैं।

गंगा- ब्रह्मपुत्र का डेल्टा, महानदी का डेल्टा, गोदावरी एवं कृष्णा का डेल्टा, कावेरी नदी का डेल्टा

– ज्वारीय वन पूर्वी तट पर अधिक पाए जाते हैं तथा गुजरात के तट पर पाए जाते हैं परंतु गुजरात के तट पर कोई नदी डेल्टा नहीं बनाती है।

अतः गुजरात के तट पर स्थित वन डेल्टाई वन नहीं बल्कि ज्वारीय वन है

– नदियों के डेल्टा क्षेत्र में तट काफी नीचे होता है अर्थात समुद्र तल के बराबर होता है जीसके परिणाम स्वरुप समुद्र का खारा जल डेल्टा क्षेत्र में प्रवेश कर जाता है जिसके कारण डेल्टा क्षेत्र की वनस्पतियां समुद्र के खारे जल में डूबी रहती हैं अतः ज्वारीय वनों के वृक्षों के छाल छारीय होते हैं।

– कठोर लकड़ी वाले वृक्ष

– जड़े पानी से बाहर झांकती रहती हैं।

– क्योंकि इस वन में मैंग्रोवा नामक वनस्पति की बहुलता होती है जिसके कारण इसे मैंग्रोव वन भी कहते हैं।

वनस्पति मैंग्रोवा, सुंदरी, कैसूरीना, फोनेक्स

– भारत में मैंग्रोव वनों के प्रमुख रूप से पांच क्षेत्र हैं।

गुजरात तट

– भारत में मैंग्रोव वनों के अंतर्गत सर्वाधिक क्षेत्रफल गुजरात तट पर है।

– गुजरात के बाद मैंग्रोव वन के अंतर्गत सर्वाधिक क्षेत्रफल आंध्र प्रदेश में है।

गंगा- ब्रह्मपुत्र डेल्टा

– गंगा ब्रह्मपुत्र का डेल्टा दुनिया का सबसे बड़ा डेल्टा है लेकिन इस डेल्टा का अधिकांश भाग बांग्लादेश में पड़ता है यही कारण है कि क्षेत्र में पाए जाने वाला मैंग्रोव वनों का क्षेत्रफल भारत में स्थित नहीं है।

– गंगा ब्रह्मपुत्र डेल्टा में सुंदरी नामक वृक्षों की बहुलता पाई जाती है जिसके कारण यहां के मैंग्रोव वन को सुंदरवन भी कहते हैं।

सुंदरवन का थोड़ा सा भाग भारत में हुगली नदी के तट पर पाए जाता है। पश्चिम बंगाल के सुंदरवन में ही बंगाल टाइगर रहता है।

महानदी डेल्टा

– महानदी डेल्टा उड़ीसा में है यहां मैंग्रोव वन पाया जाता है।

गोदावरी और कृष्णा का डेल्टा

– आंध्र प्रदेश में गुजरात के बाद सबसे ज्यादा मैंग्रोव वन आंध्र प्रदेश में पाया जाता है।

कावेरी नदी का डेल्टा

– तमिलनाडु में

मैंग्रोव वन के महत्व

– मैंग्रोव वन तटीय परिस्थितिकी का महत्वपूर्ण अंग होता है क्योंकि सुनामी और चक्रवात से तटीय क्षेत्रों की रक्षा करता है।

– समुद्री जीवो के प्रारंभिक जीवन अवस्था के अनुकूल समुद्री जीव अपने अंडों को यही सुरक्षित रखते हैं।

– इसलिए सरकार द्वारा मैंग्रोव वनों को सुरक्षा प्रदान किया जा रहा है तथा इनके क्षेत्रफल को बढ़ाया जा रहा है।

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