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भारत में प्राकृतिक वनस्पति (अध्याय -29 भारत का भूगोल )

भारत में वन वर्षा का अनुसरण करते हैं।

– भारत में अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में उष्णकटिबंधीय वर्षा वन पाए जाते हैं | विषुवत रेखा के आसपास साल भर वर्षा होती है जिसके कारण वहां उष्णकटिबंधीय सदाबहार वर्षा वन कहते हैं या विषुवतीय वन या सदाबहार वन कहते हैं क्योंकि साल भर यह वन अपनी पत्तियां नहीं गिराते हैं।

– भारत में पूर्वोत्तर में शिलांग पठार के आसपास का क्षेत्र मेघालय पठार के आसपास का क्षेत्र पश्चिमी घाट का पश्चिमी ढाल और पश्चिमी तटीय मैदान कोरोमंडल तट तथा उत्कल तट पर उष्णकटिबंधीय वर्षा वन पाए जाते हैं। (अंडमान निकोबार दीप समूह)

– उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन साल भर अपनी पत्तियां नहीं गिराते हैं तथा बहुत घने होते हैं अत्यधिक घने होने के कारण सूर्य का प्रकाश इस वन में धरातल तक नहीं आ पाता।

– कम वर्षा वाले क्षेत्रों में कटीले बनिया झाड़ियां पाई जाती हैं।

राजस्थान प्रायद्वीपीय पठार का भीतरी भाग।

जहां 70 सेंटीमीटर से कम वर्षा होती है वहां कटीले वन पाए जाते हैं।

– कोरोमंडल तट के उष्णकटिबंधीय वर्षा वन को काट दिया गया है तथा कृषि क्षेत्र का विकास कर दिया गया है मैदानी भाग होने के कारण।

– जबकि पश्चिमी घाट के पूर्वी ढाल पर पठारी भारत के विभिन्न क्षेत्रों में 70 सेंटीमीटर से भी कम वार्षिक वर्षा होती है जिसके कारण यहां कटीले वन एवं झाड़ियां पाई जाती हैं ऐसा इसलिए क्योंकि पश्चिमी घाट के पूर्वी घाट पर वृष्टि छाया प्रदेश का विकास हुआ है। इस वृष्टि छाया प्रदेश में महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र तेलंगाना कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के क्षेत्रों में कटीले वन एवं झाड़िया होती हैं क्योंकि जल पर्याप्त नहीं है।

– वनस्पतियों की एक बहुत ही महत्वपूर्ण विशेषता होती है की वनस्पतियां स्वयं को पर्यावरण की दशाओं तथा जल की उपलब्धता के आधार पर स्वयं को डाल लेती हैं। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अधिक जल की उपलब्धता है जिस कारण वर्षा वन या सदाबहार वन में चौडी पतियां विकसित हो गई हैं। यह वृक्ष अपने चौडी पत्तियों के माध्यम से भूमिगत जल का वाष्प उत्सर्जन करते हैं तथा पर्यावरण में नमी की मात्रा बनाए रखते हैं।

जबकि कम वर्षा वाले क्षेत्रों में जैसे पश्चिमी भारत पंजाब, राजस्थान, गुजरात तथा पठारी भारत के भीतरी भागों में वनस्पतियों ने स्वयं को बचाने के लिए अपनी पत्नियों को कांटों में तब्दील कर दिया है ताकि वाष्पोत्सर्जन कम हो और वह जीवित रह सकते हैं।

– वही उत्तर प्रदेश से लेकर तमिलनाडु तक और मध्य प्रदेश से लेकर झारखंड तक वर्षा मानसूनी होती है अर्थात मौसमी होती है।

मौसमी वर्षा के कारण इन क्षेत्रों अर्थात् भारत के भीतरी भागों में साल भर वर्षा नहीं प्राप्त होती जिसके परिणाम स्वरुप इन क्षेत्रों के वृक्ष सर्दी बीत जाने के बाद जब ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है तो ग्रीष्म ऋतु के आगमन के ठीक पहले इन क्षेत्रों के वृक्ष अपनी पत्तियां गिरा देते हैं क्योंकि ग्रीष्म ऋतु के आगमन पर इन क्षेत्रों की सापेक्षिक आर्द्रता घट जाती है जिसके कारण वाष्पोत्सर्जन से बचने के लिए वृक्ष अपनी पत्तियां गिरा देते हैं इसी कारण इन क्षेत्रों के वृक्षों को पतझड़ वाले वन, पर्णपाती वन और मानसूनी वन कहते हैं।

– पर्वतीय वन वर्षा का अनुसरण नहीं करते बल्कि ढाल का अनुसरण करते हैं क्योंकि पर्वतीय क्षेत्रों में ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ तापमान में तेजी से गिरावट आती है।{ क्योंकि क्षोभमंडल की यह विशेषता होता है कि धरातल से ऊपर जाने पर वायुमंडल ठंडा हो जाता है।} जिसके कारण सीमा क्षेत्रों में ही जलवायु में परिवर्तन देखने को मिलता है।

– ऊंचाई जलवायु में संशोधन कर देती है यही उष्णकटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्र में कोई पर्वत उठा हुआ है तो मैदानी क्षेत्र पर उष्ण कटिबंधीय जलवायु पाई जाएगी और पर्वत के शिखर पर ध्रुवीय जलवायु भी पाई जा सकती है या पाई जाएगी क्योंकि क्षोभ मंडल में ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ तापमान घटती है।

– उदाहरण-  अफ्रीका में विषुवत रेखा पर स्थित माउंट केन्या विषुवत रेखा क्षेत्र उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में है इसके बावजूद इसके शिखर पर ग्लेशियर पाए जाते हैं तथा हिमाच्छादित रहता है।

– यही कारण है कि हिमालय पर उचाई के आधार पर अलग अलग वन पाए जाते हैं-

हिमालय के तराई क्षेत्र में सदाबहार वन या वर्षा वन कारण

बंगाल की खाड़ी शाखा जब उत्तर भारत के मैदान में प्रवेश करती है तो अपनी दाएं ओर मुड़ने का प्रयास करती है यही कारण है कि हिमालय के तराई क्षेत्र में अच्छी वर्षा की मात्रा प्राप्त होती है जिसके कारण यहां सदाबहार वन पाए जाते हैं।

– हिमालय में और अधिक ऊपर जाने पर शीतोष्ण कटिबंधीय वन पाए जाते हैं। जैसे – देवदार, हिमाचल प्रदेश में

– और ऊंचाई पर जाने पर कोण धारी वन पाए जाते हैं इनकी पत्तियां संकरी कटोरी एवं नुकीली होती हैं।

– और ऊंचाई पर जाने पर टुंड्रा वनस्पति मिलती है जिसे अल्पाइन वनस्पति भी कहते हैं जैसे काई, घास, हीचेन।

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