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विश्व भूगोल-ब्रम्हांड chapter-1

ब्रम्हांड की उत्पति कैसे हुई –

1. आटोरिमड – धूल परिकल्पना
2. लाप्लास – निहारिका परिकल्पना
3. जॉर्ज लैमेन्टेयर – बिग- बैंग सिद्धान्त
– जार्ज लैमेन्टेयर बेल्जियम के रहने वाले थे। इन्होंने ही बिग बैंग सिद्धान्त अर्थात महाविस्फोट का सिद्धांत दिया। जार्ज लैमेन्टेयर के अनुसार लगभग 15 अरब वर्ष पहले सारे खगोलीय पिंड अर्थात तारे, ग्रह, गैलेक्सी, धूमकेतु सभी एक सघन पिंड के रूप में थे तथा कालक्रम में इस सघन पिंड में एक महाविस्फोट हुआ तथा यह सघन पिंड अनेक ब्रह्मांडीय पदार्थों के रूप में दूर दूर छिटक गए जिसे हम गैलेक्सियों के रूप में देखते हैं। आज भी यह गैलेक्सिया एक दूसरे से दूर जा रहे हैं अर्थात आज भी ब्रम्हांड का विस्तार हो रहा हैं, न कि सकुचन।

( इस अध्याय की बारीकियों को आसानी से ग्रहण करने के लिए आप मेरे यूट्यू चैनल TARGET with alok पर विश्व भूगोल का पहला वीडियो देखिये।)

गैलेक्सी

– महाविस्फोट के बाद ब्रह्मांड कई गैलेक्सियों में विभक्त हो गया।
एक केंद्र के चारो तरफ चक्कर लगाते अरबो तारो के समूह को गैलेक्सी कहते हैं।
– अनुमानतः 100 अरब गैलेक्सियाँ हैं।
– 1 गैलेक्सी में लगभग 100 अरब तारे हैं।
– गैलेक्सी के केंद्र को बल्ज कहते हैं, बल्ज में तारों का घनत्व अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा होता हैं क्योंकि तारे एक दूसरे से काफी नजदीक होते हैं। केंद्र से बाहर की ओर जाने पर तारो के बीच की दूरी बढ़ती चली जाती हैं तथा घनत्व भी कम हो जाता हैं।

(भारतीय भूगोल का दुसरा अध्याय भी अपलोड हो गया है, जिसे आप यहाँ पर देख सकते हैं:https://goo.gl/Pq9Aek)

आकाशगंगा या मन्दाकिनी या  milkyway

– ब्रम्हाण्ड के 100 अरब गैलेक्सियों में से एक गैलेक्सी आकाशगंगा हैं। हमारा सूर्य अर्थात सौरमंडल का मुखिया जिस गैलेक्सी में स्तिथ हैं, उसे आकाशगंगा कहते है। सूर्य अपने आठ ग्रहों के साथ आकाशगंगा के केंद्र का चक्कर लगा रहा हैं।
– सूर्य 25 वर्ष में आकाशगंगा के केंद्र का चक्कर लगा रहा है इसे हम ब्रम्हाण्ड कहते हैं।
– चन्द्रमा रहित आसमान में रात में सफेद रंग की धुंधली से चादर की एक चौड़ी पट्टी दिखाई देती हैं ( दक्षिण से उत्तर की और) जो आकाशगंगा की ही कोई एक भुजा हैं जिसे हम milkway कहते हैं।
-आकाशगंगा के पास स्तिथ सबसे नजदीक गैलेक्सी का नाम एंड्रोमेडा हैं।




-ओरियन नेबुला- आकाशगंगा के सबसे चमकीले तारो का समूह
– साइरस या डॉग स्टार – सूर्य के बाद सबसे चमकीला तारा परन्तु यह रात में सूर्य की अनुपस्थिति में देखा जा सकता है।
– सूर्य के बाद सबसे चमकीला पिंड चन्द्रमा हैं तथा चन्द्रमा के बाद सबसे चमकीला पिंड शुक्र हैं।
– तारे टिमटिमाते हैं पर ग्रह नही टिमटिमाते हैं, इसका कारण यह है, तारा के पास अपना उष्मा एवं प्रकाश होता हैं परंतु ग्रह किसी तारे से उष्मा एवं प्रकाश ग्रहण करते हैं
– प्रॉक्सिमा सेंचुरी- सूर्य का सबसे नजदीक तारा
– ब्रह्मांडीय दूरी मापने का मापक प्रकाश वर्ष हैं।
1 प्रकाश वर्ष- एक वर्ष में प्रकाश द्वारा तय की गई दूरी
– 9.46× 10 sq 12km
– 9.46× 10sq 15 M.

–  सबसे पहले 1609 ई. में गैलिलियो ने दूरबीन की सहायता से रात में तारो का अध्ययन किया था। गैलिलियो ने दूरबीन की सहायता से ऐसे कई तारो की खोज की जिन्हें नंगी आंखों से नही देखा जा सकता था।

(भारतीय भूगोल का तीसरा अध्याय भी अपलोड हो गया है, जिसे आप यहाँ पर देख सकते हैं: click here)

तारा

– तारो में अपनी उष्मा एवं प्रकाश होती हैं। इनके उष्मा का स्त्रोत नाभिकीय संलयन की क्रिया है। तारो में अपार मात्रा में हाइड्रोजन होता हैं तथा यह तारों का ईंधन होता हैं।
जब हाइड्रोजन के चार नाभिक मिलकर एक हीलियम (He) के नाभिक का निर्माण करे तो इस क्रिया को नाभिकीय संलयन की क्रिया कहते हैं।
इस क्रिया में अपार ऊर्जा मुक्त होती हैं। और नाभिकीय संलयन की क्रिया में उत्पन्न यही ऊर्जा तारो के ऊष्मा एवं प्रकाश के स्त्रोत होते हैं।
H+H+H+H+ =He+ अपार ऊर्जा
– किसी भी तारे का हाइड्रोजन एक समय ऐसा आएगा कि समाप्त हो जाएगा तथा नाभिकीय संलयन की क्रिया रुक जाएगी तथा तारा अपना उष्मा एवं प्रकाश खो देगा तथा ठंडा हो जायेगा अतः तारो का जीवन एक निश्चित अवधि का होता हैं।
– तारों के आकार और जीवन मे व्युत्क्रमानुपाती सम्बन्ध होता हैं अर्थात बड़ा तारा का जीवन अवधि कम तथा छोटा तारा का जीवन अवधि अधिक होगा।
किसी तारे के जीवन की प्रारम्भिक अवस्था मे उसमें हाइड्रोजन अपार मात्रा में रहता हैं जिसके कारण नाभिकीय संलयन की क्रिया के तहत उष्मा एवं प्रकाश भी अपार मात्रा में उत्सर्जित होता रहता हैं। परन्तु कालक्रम में हाइड्रोजन का मात्रा घटता चला जाता हैं और तारा का रंग भी बदलता चला जाता हैं। और तारा का तापमान भी कम होता चला जाता हैं।
नीला- सफेद- पिला- लाल
!                            !
प्रारम्भिक अवस्था         मृत अवस्था
अतः तारा का रंग उष्मा का परिचय देता हैं।



लाल तारा

– जब किसी तारे का उष्मा समाप्त हो जाता हैं तो वह लाल हो जाता हैं। और उसे लाल तारा या रेड जायन्त कहते हैं। लाल तारा का बाहरी सतह फैलता रहता हैं तथा एक समय ऐसा आता हैं कि विस्फोट हो जाता हैं इसे सुपरनोवा विस्फोट कहा जाता हैं।
– लाल तारा मे सुपरनोवा विस्फोट के बाद बचे हुवे अवशेष का द्रव्यमान अगर सूर्य के द्रव्यमान के 1.44 गुणा से कम होता हैं तो वह while dwarf अर्थात श्वेतमान तारा एक ठंडा तारा होता हैं। परन्तु कालक्रम में यह अत्यधिक ठंडा होने पर black dwarf तारा बन जाता हैं।
– परन्तु 1.44 से अधिक होने पर वह न्यूट्रॉन तारा या पल्सर तारा बन जाता हैं।

न्यूट्रॉन तारा की विशेषता-

न्यूट्रॉन तारा धीरे – धीरे सिकुड़ता चला जाता हैं अर्थात तारे का पूरा द्रव्यमान और घनत्व एक बिंदु पर आकर ठहर जाता हैं जिसके कारण इसका घनत्व असीमित हो जाता हैं तथा गुरुत्वाकर्षण इतना अधिक हो जाता हैं कि अपना पूरा द्रव्यमान अपने अंदर समेट लेता हैं। गुरुत्वाकर्षण शक्ति इतनी अधिक होती हैं कि प्रकाश का भी पलायन नही हो पाता अतः इसी कारण इसका रंग काला होता हैं। और इसे black hole या कृष्ण छिद्र या कृष्ण विवर कहते हैं।

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